Buxwah

परंपरा:बुंदेलखंड के गांव-गांव में आज भी किया जाता है ग्वालबाल नृत्य





जागेश्वरनाथ धाम पहुंचकर ग्वालबाल टोलियों ने किया दीवारी नृत्य
आधुनिकता व पश्चिमी सभ्यता का असर त्यौहारों पर जरूर पड़ा है, लेकिन बुंदेलखंड की माटी में अभी भी पुरातन परंपराओं की महक से रची-बसी है। दीपावली का पर्व देश में अलग-अलग स्थानों पर अपने-अपने तरीके से मनाया जाता है, लेकिन बुंदेलखंड की दीवारी नृत्य अब भी समूचे देश में अलग ही पहचान बनाए है।
जिसमें गौवंश की सुरक्षा, संरक्षण व संवर्धन पालन के संकल्प का इस दिन कठिन व्रत लिया जाता है और एकादशी के दिन तक दीवारी नृत्य व अन्य उत्सवों का आयोजन होता रहता है। प्रकाश पर्व में ही दीवारी गान नृत्य की अपनी अनूठी परंपरा है।




दीवारी गाने व खेलने वालों में मुख्यत: बरेदी चरवाहे जातियों के लोग होते हैं। जो दीपावली पर्व की रात भर दीवारी नृत्य करते हैं। दूसरे दिन परमा पर दीवारी गाने वाले सैकड़ों ग्वाले गांव नगर के घरों के दरवाजे पर पहुंचते हुए दीवारी नृत्य करते हुए साहोर, तेल चढ़ाई, चमचमाती तबल मृदंग की थाप पर लाठियों से दीवारी खेलते हैं।
परंपराओं से बंधे यह लोग दीवारी से देवउठनी एकादशी से चंडी मेला तक यह दीवारी नृत्य उत्सव मनाते हुए पूरे उत्साह के साथ दीवारी का प्रदर्शन करते हैं। इन्हीं परंपराओं के चलते बुंदेलखंड की दीवारी की विशिष्ट स्थान व अनूठी पहचान है।
जागेश्वरधाम पहुंचती हैं गांव-गांव की टोलियां
परमा को बुंदेलखंड के अलग-अलग जिलों व गांव गांव से सैकड़ों की संख्या ग्वालबाल जागेश्वरनाथ धाम बांदकपुर आते हैं। जो भगवान जागेश्वर महादेव के दर्शनों के बाद दीवारी नृत्य भक्ति महोत्सव मनाते हैं।
रविवार को दो दर्जन से अधिक ग्वालबालों की टोलियां बांदकपुरधाम पहुंची और दिन भर नृत्य का दौर जारी रहा। गौरतलब है कि नृत्य के माध्यम से गोवर्धन पूजन एवं मौनियों की टोलियां दीवारी नृत्य से भगवान महादेव के प्रति अपनी आस्था अर्पित करते हैं। साथ ही इस पुरातन परंपरा को आज भी कायम रखे हैं। दीपावली से बनवार, नोहटा, बम्होरी, इमलिया, रोंड, खेड़ार में दीवारी नृत्य शुरू हो जाता है

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